--------- श्रीकृष्ण माधुरी -----------------
अनुपम रूप नीलमणि को री।
उर धरी कर करि हाय! गिरत सोई, लखत बार इक भुलेंहूँ जो री।
प्रति अंगनि छवि कोटि अनंगनि, सुषमा-सुधा-सार-रस बोरी।
जिनहिंन अंगनि नैनन निरखत, तिनहिंन कहँ कह सरस बडो री।
नखशिख लखि सखि अंखियन हूँ ते, पलपल तलफति देखन को री।
कह 'कृपालु' गागर मंह सागर, आव न यतन करोर करो री॥
-जगदगुरुश्री कृपालु जी महाराज
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